Friday, 5 May 2023

अपने को पहचानिए

 अपने को पहचानिए


संसार के मनुष्यों को मोटे तौर पर 
पाँच वर्गो में विभाजित किया जा सकता है –

पहला वर्ग उन मनुष्यों का है जो अपने सुख-दुख में हँसते-रोते-गाते, कोसते, लड़ते, झगड़ते अपना जीवन बिता रहे है. उन्हे मैथुन, भोजन, वस्त्र से अधिक की न ही इच्छा है और न ही अपने जीवन-वृत्त से बाहर आने का कोर्इ चाव. 

दूसरे प्रकार की श्रेणी पहले प्रकार से कुछ अधिक उन्नत हैं, साफ-सुथरी, शिक्षित या अर्धशिक्षित है. अपने दु:खों के प्रति जागरूक नहीं हैं परन्तु उसकी पीड़ा से कातर होकर पीड़ा के मूल कारणों से अनभिज्ञ किसी र्इश्वर,देवी देवता के चरणों में माथा रगड़ते, कान पकड़ते या तंत्र-मंत्र-यंत्र की विधाओं मे पुजारी पंडितों के जाल में फँसे अपने दु:खों से मुक्ति का उपाय ढूँढ रहे हैं. अपने कष्टों के लिए ईश्वर को अथवा अन्य किसी को दोषी मानते हैं. 

तीसरे वर्ग में वे लोग हैं जो विद्वान है. धर्मशास्त्रों का जिन्हें अच्छा ज्ञान है. बात बात में शास्त्रार्थ पर उतरने को अधीर हो जाते है. उपरोक्त दोनों वर्गो की भाति ये भी दु:ख से विह्वल है. मन के स्वभाव पर बहस करते हैं पर मन इनके वश में नहीं. ध्यान पर चर्चा करते हैं पर ध्यान के एक पल का भी अनुभव नहीं. संस्कार उनसे वह सब कुछ करवा लेता है,जिसे वे जानते हैं कि वह पाप है या अकरणीय कर्म है. ऊपर से आदर्शवादी दिखते हैं परन्तु संवेदनशीलता विहीन है. यह श्रुत ज्ञानियों का वर्ग है. 

चौथी श्रेणी के लोग उपरोक्त तीनों से अधिक उन्नत है. जीवन में कलात्मक है,सृजनात्मक है और संवेदनशीलता इनका प्रमुख गुण है. इन्होने दु:ख के मूल स्वरूप और स्रोत को जान लिया है. इसलिए ये संस्कार बीज को ही नष्ट करने में लगे हुए है. यह श्रेणी ध्यानियों की, चिन्तन, मनन करने वाली आत्म विश्लेष्कों की श्रेणी है. ये प्रतिपल या तो सजग है या फिर सजगता के अभ्यास में रत है. अपने व्यवहार के प्रति,अपने विचार के प्रति इन्होने श्रुत ज्ञान को अपने जीवन में उतार लिया है. ऐसे ज्ञान को बुद्ध भावित प्रज्ञा कहते है. 
पाँचवीं श्रेणी उन विशिष्ट महामानवों और महात्माओं की है जिन्होने जीवन के चक्र से स्वयं को मुक्त कर लिया है, और मानव के उत्थान के प्रतिसतत जागरूक और प्रतिबद्ध है. ये उच्चकोटि के महानायक, हमारे संरक्षक और मार्गदर्शक है. 

पाँचवीं श्रेणी के महानायक भी उसी रास्ते से चलकर वहाँ पहुँचे जहाँ आज हम खड़े हैं. हमें भी इन्ही रास्तों से चलकर वहां पहुंचना जहां आज वे खड़े हैं. उन्होंने मन की उन्ही बाधाओं को पार किया है, जो आज हमारे मार्ग में अडिग शिला बनकर खड़ी है. रास्ता पार करना कठिन तो है परन्तु असम्भव नहीं. कबीर ने मन की अकथ कथा कही - 

कहत कबीर समुझाय जो कोई मन को समझ ले वाको काल न खाय. 

तो आइये सदियों से बन्द मन के द्वार को खोलें और भीतर प्रवेश करें और देखें कि पूर्व जन्मों से आज तक क्या क्या अनुभव या संस्कार वहाँ हमने जमा कर रखे हैं. मन के द्वार को खोलना, भीतर जाना, संग्रहीत वस्तुओं का निरीक्षण करना, उपयोगी-अनुपयोगी, सत-असत, कुशल-अकुशल, आवश्यक-अनावश्यक की छटनी करना, अनुपयोगी को स्टोर से बाहर निकाल कर फेंक देना- यही ध्यान हैं. आज से अपने को पहचानिए.

आज बस इतना ही,
पवन बख्शी
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अपने को पहचानिए, पाँच वर्गो में विभाजित मनुष्यों में से आप अपने को कहाँ पाते हैं ?

क्या आप अगले चरण में जाने की इच्छा रखते हैं. हम आपका मार्ग दर्शन करने का प्रयास करेंगे 
तो ऊपर दिए गए सर्वे फॉर्म में वोट दे कर हमें भी बताएं 

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